
कहानी संचयन ‘अज्ञेय’ का समय। आज़ादी के पहले और ठीक बाद में बिंधा। ऐसा समय जो कतई हल्का नहीं बैठता, काँधों पर। चूँकि अतिरिक्त ज़ोर, दबाव और मकसद की मची है कि हम निर्माण कर रहे हैं एक नए वक़्त का और हम करके रहेंगे। भूलने, भटकने, की कलाकार की प्यास, वक़्त की इन औचित्यपूर्ण, निष्ठा-भरी माँगों के भार में फँसती-सी है। कभी तो यह अहसास, खासे प्रत्यक्ष तरह से, ‘अज्ञेय’ के लेखन में झलकता है। वाकई अज्ञेय एक नई भाषा गढ़ रहे हैं, इतनी गम्भीरता से कि बीन-बीन के उठा लाए हैं शब्द जो नए गठबन्धनों में असमंजस से हमें ताक रहे हैं। ‘अज्ञेय’ की कहानियों में विषय की गज़ब की विविधता है, भाषा, शैली की भी। प्रकृति-मानव का रिश्ता है कहीं, रचना-प्रक्रिया पर खयाल कहीं, प्राचीन मिथक कहीं, और देश-विदेश का इतिहास - रूस, चीन, तुर्की, मुल्क का बँटवारा - आदम हउवा कहाँ-कहाँ ले जाती है जानने, महसूस करने की उनकी ललक। कहानियाँ खुद कहेंगी। बकौल अज्ञेय ‘कहानी पर प्रत्यय रखो, लेखक पर नहीं।’ आइए, आप भी इस प्रगाढ़ ‘अज्ञेय’ माहौल में...।